क्या है चौरी-चौरा कांड, इसके ऐतिहासिक महत्व को भी जानिए…

चार फरवरी 1922 को चौरीचौरा के भोपा बाजार में सत्याग्रही जुटे थे। उन्हीं में से एक की गांधी टोपी को एक सिपाही ने पांवों तले रौंद दिया था। इसी पर सत्याग्रही आक्रोशित हो उठे और उन्होंने पुलिसवालों को दौड़ा लिया। पुलिसवाले भागकर थाने में छिप गए। थाने को सत्याग्रहियों ने घेर लिया। पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी, जिसमें तीन सत्याग्रही मौके पर शहीद हो गए।
घटना में 50 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। गुस्साए क्रांतिकारियों ने पुलिस चौकी को आग लगाकर दारोगा समेत 23 पुलिसकर्मियों को जला दिया था, जिसमें 19 लोगों को फांसी की सजा हुई थी।
थानेदार गुप्तेश्वर सिंह, उपनिरीक्षक सशस्त्र पुलिस बल पृथ्वी पाल सिंह, हेड कांस्टेबल वशीर खां, कपिलदेव सिंह, लखई सिंह, रघुवीर सिंह, विशेषर राम यादव, मोहम्मद अली, हसन खां, गदाबख्श खां, जमा खां, मगरू चौबे, रामबली पांडेय, कपिल देव, इंद्रासन सिंह, रामलखन सिंह, मर्दाना खां, जगदेव सिंह, जगई सिंह, और उस दिन वेतन लेने थाने पर आए चौकीदार बजीर, घिंसई, जथई व कतवारू राम की मौत हुई थी।
हिंसा के सख्त खिलाफ महात्मा गांधी ने इस घटना के परिणामस्वरूप 12 फरवरी 1922 को राष्ट्रीय स्तर पर असहयोग आंदोलन वापस ले लिया था। 16 फरवरी 1922 को महात्मा गांधी ने अपने लेख ‘चौरी चौरा का अपराध’ में लिखा था कि अगर ये आंदोलन वापस नहीं लिया जाता तो अन्य जगहों पर भी इस तरह की घटनाएं देखने को मिल सकती थीं। हालांकि गांधी जी के इस फैसले को लेकर क्रांतिकारियों ने नाराजगी जाहिर की थी।
कहा जाता है कि चौरी-चौरा के इस घटना की पृष्ठभूमि 1857 के गदर से ही तैयार होने लगी थी। जंगे आजादी के पहले संग्राम (1857) में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ पूवार्ंचल के तमाम रजवाड़ों, जमीदारों (पैना, सतासी, बढ़यापार नरहरपुर, महुआडाबर) की बगावत हुई थी। इस दौरान हजारों की संख्या में लोग शहीद हुए। इस महासंग्राम में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से शामिल आवाम पर हुक्मरानों ने अकल्पनीय जुल्म ढाए। बगावत में शामिल रजवाड़ों और जमींदारों को अपने राजपाट और जमीदारी से हाथ धोना पड़ा। ऐसे लोग अवाम के हीरो बन चुके थे। इनके शौर्यगाथा सुनकर लोगों के सीने में फिरंगियों के खिलाफ बगावत की आग लगातार सुलग रही थी। उसे भड़कने के लिए महज एक चिन्गारी की जरूरत थी।
ऐसे ही समय 8 फरवरी 1920 को गांधी जी का गोरखपुर में पहली बार आना हुआ। बाले मियां के मैदान में आयोजित उनकी जनसभा को सुनने और गांधी को देखने के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ा था। दस्तावेजों के अनुसार, यह संख्या 1.5 से 2.5 लाख के बीच रही होगी। उनके आने से रौलट एक्ट और अवध के किसान आंदोलन से लगभग अप्रभावित पूरे पूर्वांचल में जनान्दोलनों का दौर शुरू हो गया। गांव-गांव कांग्रेस की शाखाएं स्थापित हुईं।
वहां से आंदोलन के लिए स्वयंसेवकों का चयन किया जाने लगा। मुंशी प्रेम चंद (धनपत राय) ने राजकीय नार्मल स्कूल से सहायक अध्यापक की नौकरी छोड़ दी। फिराक गोरखपुरी ने डिप्टी कलेक्टरी की बजाय विदेशी कपड़ों की होली जलाने के आरोप में जेल जाना पसंद किया। ऐसी ढ़ेरों घटनाएं हुईं। इसके बाद तो पूरे पूर्वांचल में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ माहौल बन चुका था। गांधी के आगमन के बाद 4 फरवरी 1922 को गोखपुर के एक छोटे से कस्बे चौरी-चौरा में जो हुआ वह इतिहास बन गया।
अब्दुल्ला, भगवान, विक्रम, दुदही, काली चरण, लाल मोहम्मद, लौटी, मादेव, मेघू अली, नजर अली, रघुवीर, रामलगन, रामरूप, रूदाली, सहदेव, संपत पुत्र मोहन, संपत, श्याम सुंदर व सीताराम को घटना के लिए दोषी मानते हुए फांसी दी गई थी।