मायावती का 65वां जन्मदिनः पार्टी को हाशिए से सत्ता तक पहुंचाने की चुनौती और अपनों का दूर जाना…

पूर्व मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती 15 जनवरी को अपना 65 जन्मदिन मनाने जा रही हैं। जन्मदिन से पहले उन्होंने कार्यकर्ताओं को दिए एक संदेश में कहा है कि उनका जन्मदिन जनकल्याणकारी दिवस के रूप में मनाया जाए। देश में आयरन लेडी के नाम से विख्यात मायावती उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रही हैं। लेकिन अब उनके सामने पार्टी के अस्तित्व को बचाने की चुनौती है। लगतार चार चुनाव हारने तथा पार्टी के बड़े नेताओं की बगावत ने उन्हें हिलाकर रख दिया है। इसके अलावा उनकी सबसे बड़ी चुनौती परंपरागत वोट बैंक को संजो कर रखने की है जो धीरे-धीरे खिसकता जा रहा है।
वर्ष 2012 में मायावती को ऐसी शिकस्त झेलनी पड़ी की 9 सालों में उन्हें किसी भी चुनाव में जीत हासिल नहीं हुई। अब स्थिति यह है कि 2022 के चुनाव में वह किसका साथ देंगी या लेंगी असमंजस में हैं। उन्होंने गठबंधन की राजनीति का भी हश्र देख लिया है किसी तरह राजनीतिक स्वार्थ के लिए राजनीतिक दल स्थिति पलटने में देर नहीं लगाते हैं।
बसपा सुप्रीमों मायावती अपने 30 साल सियासी सफर ऐसी नरवश कभी नहीं दिखीं थीं। लगातार चार चुनाव हारना और बड़े नेताओं का साथ छोड़ देना उनके लिए किसी बड़े सदमे से कम नहीं था। इसके अलावा उनके ऊपर पैसे लेकर टिकट देने जैसे गंभीर आरोप भी लगे हैं। हालांकि अपनी राजनीति स्थिति को मुकाम देने के लिए 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने गेस्ट हाउस कांड को भी भुला दिया और समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर लिया।
मायावती को ये गठबंधन भी रास नहीं आया। उन्हें जो उम्मीद थी परिणाम उसके एकदम उलट आया। हालांकि उनकी सीटों में थोड़ी बढ़रोत्तरी हुई लेकिन उनकी उम्मीदों को परवान नहीं चढ़ा सका। 2014 में उन्हें जहां शून्य पर थीं 2019 में उन्हें 10 सीटें मिल गईं और इस बार उन्होंने हार का ठीकरा अखिलेश यादव के सिर फोड़ कर गठबंधन तोड़ लिया। अब एक बार फिर परीक्षा की घड़ी धीरे-धीरे समीप आ रही है, इस बार क्या करेंगी मायावती अकेले दम पर चुनाव मैदान में उतरेंगी या फिर किसी गठबंधन की बाहें थामकर वैतरणी पार करने की कोशिश करेंगी।
30 सालों से राजनीति अनुभव रखने वाली मायावती 1989 में पहली बार सांसद बनी थीं। 1995 में वह अनुसूचित जाति की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। राजनीति में आने से पहले मायावती शिक्षिका थीं। 21 मार्च 1997 को मायावती ने दूसरी बार यूपी की मुख्यमंत्री की कमान संभाली। 3 मार्च 2002 को मायावती तीसरी बार यूपी की मुख्यमंत्री बनीं और 26 अगस्त 2002 तक पद पर रहीं। 13 मई 2007 को मायावती ने चौथी बार सूबे की कमान संभाली और 14 मार्च 2012 तक मुख्यमंत्री रहीं।
2001 में बसपा के संस्थापक कांशीराम ने मायावती को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। 2002-2003 के दौरान भारतीय जनता पार्टी की गठबंधन सरकार में मायावती फिर से मुख्यमंत्री बनीं। भाजपा ने समर्थन वापस लिया तो मायावती की सरकार गिर गई और सूबे की कमान मुलायम सिंह यादव सीएम बने। मायावती 2007 के विधानसभा चुनाव जीतकर फिर से सत्ता में लौटी और यूपी की कमान संभाली। 2012 के विधानसभा चुनाव में मायावती की बहुजन समाजवादी पार्टी चुनाव हार गई। तब से लेकर आज तक मायावती को कोई जीत हासिल नहीं हुई है।
इसके अलावा मायावती के सामने अपने परंपरागत वोट बैंक को बचाने के साथ ही नवउदित दलित संगठनों से भी पार पाना एक बड़ी चुनौती है। दरअसल मायावती पार्टी की स्थिरता और उसे संगठित करने के अपने पुराने तौर तरीकों पर ज्यादा फोकस करती रही हैं और कर रही हैं। इससे इतर नव उदित दलित संगठन ज्यादा आक्रामक अंदाज में यह समझाने का प्रयास कर रही हैं कि उनके बिना कोई भी राजनीतिक दल सत्ता तक आसानी से नहीं पहुंच सकता है। मायावती को अब इन नवउदित संगठनों की तरह ही सोचना होगा।
इसके अलावा मायावती पर परिवारवाद की काली छाया पड़ती नजर आ रही है। नए दलित संगठन लोगों के बीच यह संदेश देने में कामयाब होते दिख रहे हैं कि बसपा अब एक परिवार की पार्टी होकर रह गई है। इससे मायावती का परंपरागत वोट बैंक दूसरी तरफ शिफ्ट होता जा रहा है। इसके अलावा मायावती का खुद राजनीतिक समर से दूर रहना पार्टी के लिए घातक होता नजर आ रहा है। मायावती दूसरे रास्ते से सत्ता तक पहुंचना चाहती है जो पार्टी के सिद्धान्तों से सर्वथा अलग है।
अब 2022 बस आने ही वाला है, अग्नि परीक्षा का घड़ी सिर पर है तो देखना यह है कि मायावती कौन का दांव खेलती हैं। हालांकि अभी तक का जो अनुमान लगाया गया है उसके मुताबिक बसपा अकेले चुनावी समर में उतरेगी। नाम न छापने की शर्त पर एक वरिष्ठ बसपा नेता ने बताया, पार्टी का गठबंधन का अनुभव बेहद कड़वा रहा है। चाहे वह भाजपा हो या फिर सपा या फिर कांग्रेस सबने अपने स्वार्थ के लिए बसपा से गठबंधन किया। उन्होंने बताया कि अब मायावती ने मान लिया है कि वह अकेले ही चुनावी समर में हाथ आजमाएंगी, इसके अलावा उन्होंने यह भी बताया कि अगर कोई दल बसपा के साथ उनकी शर्तों पर गठबंधन करता है तो उनके लिए रास्ते खुले रहेंगे।