BSP का भाग्य बदलने सामने आया बसपा का यूथ ब्रिगेड, सोशल मीडिया के जरिए झोंकी ताकत

बड़ा सवालः यूथ ब्रिगेड क्या बसपा का रूठा भाग्य बदल पाएगा ?

बसपा सुप्रीमों मायावती
उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के गिने चुने दिन ही बचे हैं। इसके पहले प्रदेश की सियासत उफान पर है। भाजपा का आंतरिक सर्वे उसे डरा रहा है तो वहां सक्रियता बढ़ गई। सर्वे में जो दिखा उससे विपक्षी दल विशेषकर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की बांछे खिल गई हैं। कांग्रेस फिलहाल किसानों के कंधे पर चढ़कर सत्ता तक पहुंचने की जुगत मे हैं लेकिन शांत है। बीते 10 सालों से बसपा सत्ता के विकल्प में रूप में अपने को सामने ला पाने में अक्षम ही साबित हुई। जहां तक सपा का सवाल है तो उसने 2022 के विधानसभा चुनाव जीतने के लिए अपने सारे घोड़े खोल रखे हैं। सत्ताधारी भाजपा पर आक्रमण करने का कोई मौका नहीं चूक रही है।

बसपा से निकाले गए नेता सपा में हो रहे शामिल
इधर बसपा और सपा में रस्साकशी का खेल तेज हो गया है। बसपा के बागी या फिर निकाले गए पुराने नेता अब सपा का दामन थामते जा रहे हैं। बसपा नेताओं के सपा में जाने के बसपा प्रमुख मायावती काफी नाराज हैं। उन्होंने सपा पर तंज कसते हुए कहा है कि सपा उन बसपा नेताओं को शामिल कर रही है जिन्होंने महत्व खो दिया है। बसपा से निकाले गए ये नेता अब सपा को भी कही का नहीं छोड़ेंगे।

बसपा के युवा कार्यकर्ताओं ने ली जिम्मेदारी
पुराने नेताओं के बसपा छोड़ देने से पार्टी के सामने चुनाव के समय संकट की स्थिति उत्पन्न हो गई है। किसके दम पर वह चुनाव में अन्य पार्टियों का सामने करेगी। अब लगता है बसपा को इस समस्या से जल्द ही छुटकारा मिल जाएगा। दरअसल बसपा के युवा कार्यकर्ताओं ने पार्टी को उत्थान पर ले जाने का जिम्मा अपने ऊपर ले लिया है। सोशल मिडिया पर जिस तरह से उनकी सक्रियता बढ़ी है वह किसी भी पार्टी के सिरदर्द साबित हो सकता है।
युवा फोर्स के साथ बसपा के नेता फिलहाल नहीं
प्रदेश में बसपा की पुरानी स्थिति में लाने के लिए युवाओं की नई पौध जिसे बसपा फोर्स कहा जा सकता है उठ खड़ी हुई है। इसकी कमान बसपा के नेताओं के हाथ में नहीं बल्कि खुद को बसपा समर्थक मानने वाले युवाओं के हाथ में है। ये वो लोग हैं जो पार्टी के कार्यकर्ता तो नहीं लेकिन इनकी अगुवाई में बसपा से जुड़ा एक ऐसा युवा फोर्स तैयार हो चुका है जिसने सोशल मीडिया के जरिए 2022 में बसपा को सत्ता पर दोबारा लाने का अभियान छेड़ दिया है।

इन नारों के जरिए दे रहे संदेश
बसपा की ये यूथ फोर्स नए और नए कलेवर में नारों के जरिए लोगों में संदेश दे रहे हैं। कुछ नारे जो सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रहे हैं उनकी। हर जिसे से मायावती के सीएम बनाने के नारे सामने आ रहे हैं। नारों की कुछ बानगी इस तरह से है। वही हमारा साथी जिसके घर पर हाथी, जन-जन की यही पुकार, माया बहन अबकी बार, उम्मीदों का साथी बसपा का हाथी। गौर करने वाली बात ये है कि बसपा की ये युवा फोर्स ने सोशल मीडिया पर दायरा बढ़ा लिया है।
शिक्षक, छात्र-छात्राएं और लेखक आए इस मुहीम के साथ
बसपा की ये फोर्स सोशल मीडिया से सभी मंचों से लोगों को जोड़ने की मुहीम में लगे हैं। इस काम में तमाम बसपा समर्थक, छात्र-छात्राएं, लेखक, शिक्षक और पत्रकार शामिल हैं। इनकी ट्वीटर पर फैन लोविंग भी लाखों में हैं। उनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। ये सभी समर्थक बसपा के विचारों को सोशल मीडिया के जरिए पूरे देश में फैला रहे हैं।
सोशल मीडिया के हर मंच का कर रहे इस्तेमाल
इसके अलावा बसपा को सत्ता में लाने और मायावती को दोबारा सत्ता में लाने के लिए बसपा का ये युवा वर्ग यूट्यूब और वेबसाइट के जरिए पार्टी को मजबूत करने में दिन रात लगे हैं। कुछ नाम इस प्रकार हैं। अम्बेडकराइट पीपुल्स वॉयस, भीम टीवी और द थिंक जैसे यूट्यूब चैनल के लाखों में सबस्क्राइबर्स हैं। बहुजनबोलेगा.कॉम, बहुजनसंघटन.इन जैसी वेबसाइट्स की भी अच्छी रीडरशिप है।

संकट की स्थिति से उबारेंगे युवा
युवाओं के इस प्रकार बसपा के साथ जुड़ना बसपा के लिए अच्छा संकेत है। कई चुनावों में दलित वोट बसपा से छिटक कर दूसरे दलों के साथ जुड़ता जा रहा था जो बसपा के लिए मुसीबत का कारण बना था। अब उस स्थिति से बसपा को कुछ हद तक राहत मिलती नजर आ रही है। बसपा विचारक भी इस बात को मानते हैं कि अपने परंपरागत वोटों के दूर होने से नुकसान तो उठाना पड़ा है।
बड़ा सवाल- बसपा सड़कों पर आंदोलन क्यों नहीं करती?
उनका कहना है किसी मुद्दे को लेकर सड़कों पर आंदोलन करना बसपा की रणनीति का एक हिस्सा है। ऐसा करना बसपा की आलोचना का कारण बना। लोग मानने लगे थे की बसपा ने अपना जनाधार खो दिया है। लेकिन सोशल मीडिया पर बसपा के साथ युवाओं की नई फोर्स ने स्थिति को बदल कर रख दिया है। पार्टी कार्यकर्ता आंदोलन क्यों नहीं करते यह प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है लेकिन विचारक मानते हैं कि इसके अहम कारण बसपा काडर के हित में है।

बसपा के खिलाफ फैलाया गया भ्रम
दलित विचारक कहते हैं, बसपा खत्म हो गई है इसके पीछे बड़ा राजनीतिक कारण है। दलित वोटरों में इस बात की अफवाह फैलाई जा रही है जिससे वोटर भ्रमित हो जाएं और बसपा को छोड़कर दूसरी पार्टी के साथ चले जाएं। बीते कुछ चुनावों में ऐसा देखा भी गया। चुनाव के पहले बसपा को लेकर ऐसा भ्रम फैलाया गया। लेकिन सच्चाई ये है कि बसपा देश की ऐसी इकलौती पार्टी है जो नेता बनाने की फैक्ट्री है। 2022 में अन्य पार्टियों का इसका अंदाजा लग जाएगा।

कितने सफल होंगे बसपा समर्थक ये युवा…
हालांकि युवाओं ने बसपा की मांछी की पतवार तो थाम लिया है लेकिन इसे अंजाम तक पहुंचाने की जिम्मेदारी बसपा से सांगठनिक ढांचे पर ही निर्भर है। मायावती इससे कितनी मुतमईन हैं या फिर वह युवाओं की इस मुहीम में कितनी सक्रिय हो सकती है आने वाला वक्त बताएगा। लेकिन यह भी उतना ही सच है अगर बसपा का ये युवा वर्ग लगातार अपनी सक्रियता को बरकरार रखता है तो आने वाले चुनाव में हलचल मचनी तय है। फिलहाल एक सवाल तो बनता है, कितना सफल होगा युवाओं का ये अभियान…