बसपा का ब्राह्मण मोहः ये राह नहीं आसान, 14 साल में बसपा के 12 ब्राह्मण नेताओं ने छोड़ा साथ

14 सालों में बसपा के 12 ब्राह्मण नेता या तो पार्टी छोड़ गए या फिर उन्हें निष्कासित कर दिया गया

बसपा सुप्रीमों सुश्री मायावती
उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर ब्राह्मण समुदाय को लेकर रस्साकशी का खेल चल रहा है। सबको इस बात का इल्म है कि सत्ता पर काबिज होना है तो ब्राह्मण मतों को अपने हिस्से में लाना होगा। क्या ब्राह्मण मतों को अपने पाले में करना इतना आसान होगा। यह बात भी गौर करने वाली है कि ब्राह्मण लंबे समय तक सत्ता की धुरी हुआ करते थे जिनके बिना सत्ता का खेल चल पाना आसान नहीं होता था लेकिन स्थिति बदलने के साथ ही उन्हें सत्ता में उचित प्रतिनिधित्व न मिल पाने के कारण वह धीरे-धीरे अलग-थलग होते चले जा रहे हैं। इसी बात का फायदा सियासी दल उठाने में लगे हैं।
14 साल बाद ब्राह्मणों को फिर रिझाने की कोशिश
अब तकरीबन 14 साल के बाद ब्राह्मण समुदाय को एक बार फिर बसपा प्रमुख मायावती अपने साथ लाने की कवायद में लग गई हैं। ब्राह्मणों को बसपा के साथ जोड़ने की जिम्मेदारी पार्टी महासचिव सतीश मिश्रा के कंधों पर है। यही सतीश मिश्रा वर्ष 2007 में बसपा के सोशल इंजीनियरिंग के मास्टर माइंड थे जिन्होंने ब्राह्मण समुदाय को बसपा के साथ जोड़ कर सत्ता तक पहुंचाया था।
ब्राह्मण नेताओं ने छोड़ दी थी पार्टी
लेकिन क्या वर्तमान पारिदृश्य ऐसा है जिसमें ब्राह्मण समुदाय बसपा के साथ जुड़ेगा। सत्ता के खेल में बसपा ने हित साधने के बाद 14 सालों में तमाम ब्राह्मण नेताओं को या तो पार्टी से निष्कासित कर दिया या फिर ये नेता दूसरी पार्टियों का दामन थामकर सत्ता सुख भोग रहे हैं।
प्रबुद्ध सम्मेलनों के जरिए ब्राह्मणों को जोड़ने का प्रयास
बसपा महासचिव प्रदेशके 18 मंडलों में प्रबुद्ध सम्मेलनों के जरिए ब्राह्मण समुदाय को बसपा के साथ जोड़ने के काम में लग गए हैं। अयोध्या में राम मंदिर में मत्था टेकने के साथ ही उन्होंने इसकी शुरुआत कर दी है। हर प्रबुद्ध सम्मेलनों के जरिए वह ब्राह्मण समुदाय को संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं कि ब्राह्मणों का हित बसपा के साथ ही है। इस प्रयास में उन्होंने कई ब्राह्मण नेताओं को बसपा में वापसी भी दिलाई है।
11 फीसदी ब्राह्मण और 23 फीसदी दलित दिला सकते हैं सत्ता
प्रबुद्ध सम्मेलनों में सतीश मिश्रा कहते हैं कि अगर 11 फीसदी ब्राह्मण और 23 फीसदी दलित वोटों के जरिए सत्ता पर काबिज हुआ जा सकता है। अगर ऐसा होता है तो बसपा को सत्ता में आने से कोई रोक नहीं सकता है। इसके लिए उन्होंने ब्राह्मणों को समझाने का प्रयास भी किया है कि ब्राह्मणों को बसपा में उचित प्रतिनिधित्व भी दिया जाएगा जिसके वह हकदार हैं। लेकिन इतिहास में झांके तो ब्राह्मणों को बसपा में वह सम्मान नहीं मिला था जिसके वह वास्तव में हकदार थे।
2007 में बसपा से 41 ब्राह्मण जीते थे
बता दें, वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में ब्राह्मणों ने बसपा का साथ दिया था। उनके पास विकल्प नहीं थे। सपा की मुस्लिम परस्त नितियां और भाजपा का कमजोर होना ब्राह्मण समुदाय को बसपा के निकट लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। लेकिन वर्तमान परिस्थितियां उसके एकदम उलट हैं। अब भाजपा कमजोर नहीं है और बसपा में उतनी ताकत नहीं बची है जिसके आधार पर ब्राह्मण समुदाय बसपा के साथ जाएं। 2007 में बसपा के 41 ब्राह्मण नेता जीतकर आए थे। लेकिन इन 14 सालों में तमाम ब्राह्मण नेताओं ने बसपा का साथ छोड़ दिया या फिर उन्हें निष्कासित कर दिया गया।
संत समाज ने जताई है नाराजगी
बसपा के प्रबुद्ध सम्मेलनों को लेकर संत समाज ने भी अपनी नाराजगी जताई है। अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेन्द्र गिरी ने कहा, कभी तिलक, तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार का नारा देने वाली पार्टी सियासी फायदे के लिए ब्राह्मण सम्मेलन कर रही है। पार्टी को उनके सम्मान की बात अचानक कैसे आ गई। उन्होंने कहा, सिर्फ सियासी फायदे के लिए ब्राह्मण सम्मेलन आयोजित किए जा रहे हैं।
बसपा के पास नहीं है कोई बड़ा ब्राह्मण चेहरा
इसके अलावा बसपा को सत्ता तक पहुंचाने वाले ब्राह्मण नेताओं ने बसपा का साथ छोड़ दिया है। बसपा के पास केवल सतीश मिश्रा, पवन पांडेय, नकुल दूबे, विनय तिवारी और रत्नेश पांडेय ही हैं। इनमें से किसी का कद इतना पड़ा नहीं है कि वह ब्राह्मणों को बसपा के साथ जोड़ने का दम रखते हों। ऐसे में ब्राह्मण मतदाता कैसे एकाएक बसपा के पक्ष में गोलबन्द हो जायेंगे।
आइए जानते हैं कितने ब्राह्मण नेताओं ने बसपा का साथ छोड़ा है…
1-अवध क्षेत्र में बसपा का प्रमुख ब्राह्मण चेहरा बृजेश पाठक अब भाजपा में शामिल हैं। 2017 में उन्होंने बसपा का साथ छोड़ दिया।
2-बृज क्षेत्र में बसपा का प्रमुख ब्राह्मण चेहरा रामवीर उपाध्याय अब भाजपा में हैं।
3-फूलपुर से पूर्व सांसद कपिल मुनि कारवरिया और उनके भाई पूर्व एमएलसी सुरजभान करवरिया को मायावती ने पार्टी से निष्कासित कर दिया। सूरजभान करवरिया फिलहाल भाजपा में हैं। उनकी पत्नी नीलम कारवरिया प्रयागराज से भाजपा सांसद हैं।
4-प्रयागराज के दिग्गज विधायक राकेश धर त्रिपाठी जिसे मायावती का करीबी माना जाता था उनके साथ उनके भतीजे पंकज त्रिपाठी को मायावती ने पार्टी से निकाल दिया।
5-अयोध्या के इंद्रप्रताप तिवारी 2017 में बसपा का साथ छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया।
6-बिनगा सीट से 2007 ने जीतने वाले ददन मिश्रा ने भी 2012 में बसपा का साथ छोड़ दिया और भाजपा में शामिल हो गए, 2014 में वह भाजपा सांसद के तौर पर चुने गए।
7-पश्चिम यूपी में बसपा के प्रमुख ब्राह्मण चेहरे से रूप में पहचान रखने वाले गुड्डू पंडित को मायावती ने बाहर कर दिया।
8-प्रतापगढ़ में राजा भैया को चुनौती देने वाले शिवप्रसाद सेनानी ने 2019 में बसपा छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया।
9-इसके अलावा प्रतापगढ़ के रानीगंज सीट से 2007 में विधायक रहे शिरोमणि शुक्ला भी बसपा को छोड़ दिया था। वह दोबारा बसपा में लौट आए हैं।
10-मथुरा के कद्दावर नेताओं में शुमार पंडित श्याम सुंदर वर्मा मांट सीट से विधायक बने थे लेकिन मायावती ने उन्हें बाहर कर दिया।
11-अंटू मिश्रा जिनका सियासी कद बसपा में काफी ऊंचा था वह सतीश मिश्रा के रिश्तेदार भी हैं। लेकिन एनआरएचएम घोटाले ने उनको बाहर का रास्त दिखाया।
12-झांसी में बसपा का ब्राह्मण चेहरा पंडित रमेश शर्मा और उनके बेटे अनुराग शर्मा ने भी बसपा का साथ छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया। अनुराग शर्मा झांसी से भाजपा सांसद चुने गए।
गौरतलब है कि वर्ष 2007 में जब बसपा की सत्ता बनी उस दौर में भी ब्राह्मणों को 40 फीसदी वोट भाजपा को मिला था। अब हालात भाजपा के मुफीद है, ऐसी स्थिति में अगर ब्राह्मण मत भाजपा से अलग होते हैं तब भी सपा और बसपा को चुनौतियों का सामना तो करना ही होगा। कांग्रेस भी ब्राह्मण मतों को हासित करने का पूरा प्रयास कर रही है जबकि भाजपा ने ब्राह्मण समुदाय को अपने पाले मे रखने का हर संभव प्रयास कर रही है।