चुनाव जीतना है तो दाग अच्छे हैं , हर चुनाव में बढ़ जाती है इनकी संख्या

चुनाव आयोग की कोई सुनता नहीं, राजनीति दल हों या नेता, चुनाव आयोग के दिशा निर्देश की आंशिक पालन ही होता है। ये लोकसभा चुनाव में तो दिखा ही था दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी दिखा। नेता अनर्गल बयानबाजी से बाज नहीं आते आयोग चाहे कुछ भी कहे वह अपनी मनमानी करते ही हैं। ऐसा ही हाल है राजनीति में दागदार उम्मीदवारों की बढ़ती संख्या को लेकर। चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों से कई बार इस बात के लिए निर्देश जारी किए कि दागदाग उम्मीदवारों को चुनाव में टिकट न दें लेकिन किसी ने नहीं सुनी। राजनीतिक दलों के लिए तो चुनाव जीतना है तो दाग उनके लिए बेहद कीमती हो जाते हैं। लेकिन अब देश की सर्वोच्च अदालत ने साफ कर दिया कि महज चुनाव जीत नहीं हो सकता है टिकट का आधार…
दलों की नजर में जिताऊ उम्मीदवार हैं दागदार
राजनीति के अपराधीकरण पर सियासी पार्टियां लगातार खुद को पाक-साफ बताती हैं लेकिन चुनावी वैतरणी पार करने के लिए वे ऐसे उम्मीदवारों का सहारा लेती हैं। जिताऊ उम्मीदवार हर दल को चाहिए, भले ही उस पर संगीन आरोप हों हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुंचा लेकिन राजनीति में अपराधी उम्मीदवारों का आना बदस्तूर जारी है। दरअसल अब राजनीति दलों का मानना है कि दागदारों के जीतने का प्रतिशत बेदाग उम्मीदवारों की तुलना में बेहतर होता है और शायद जनता भी यही चाहती है जितना दबंग उम्मीदवार उतना ही तेज काम।
लोकसभा में 20 फीसदी तक बढ़ी दागदार सासंदों की संख्या
लोकसभा में बीते 15 सालों में दागी उम्मीदवारों संख्या में तेजी आई है। इन 15 सालों में लोकसभा दागी सांसदों की संख्या 20 फीसदी तक बढ़ गई। मौजूदा निचले सदन में तकरीबन आधे सांसद आपराधिक पृष्ठभूमि वाले हैं। पिछले चार लोकसभा चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि राजनीतिक दलों का दागी उम्मीदवारों पर कितना भरोसा है।
2019 की लोकसभा में हैं 43 फीसदी दागदार सांसद
2004 में 24 फीसदी दागी सांसद थे तो 2009 में इनकी संख्या बढ़कर 30 फीसदी हो गई, 2014 में यह आंकड़ा 34 फीसदी तक पहुंच गया मतलब 185 सांसद आपराधिक पृष्ठभूमि वाले थे तो 2019 में इस आंकड़ें में और उछाल आया और यह संख्या 43 फीसदी तक पहुं गई। कहा जा सकता है कि हर तीसरा सांसद किसी न किसी अपराध में आरोपी रहा है। बतादें 2019 में जीतकर संसद पहुंचे 29 फीसदी सांसदों (159 सांसद) पर गंभीर आरोप हैं। कांग्रेस के इड्डुकी (केरल) के सांसद पर अकेले 204 मुकदने पंजीकृत हैं।
विधानसभाएं भी नहीं है अछूती
ये तो थी लोकसभा में सांसदों के दागी होने की बात अब जरा विधानसभाओं पर नजर डाल ली जाए। यहां भी सियासत में अपराधी विधायकों का ही बोलबाला है। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान या फिर देश का कोई भी राज्य हो सियासत में दाग अच्छे होने की कहानी हर जगह मौजूद है। कोई दल इससे अछूता नहीं और हर दल का दावा उससे पाक-साफ कोई नहीं।
यूपी में 8 विधायकों पर हत्या और 34 पर हत्या के प्रयास का मुकदमा
विधानसभाओं में भी हाल कुछ ऐसा ही है। सभी राज्यों में ऐसे विधायक मिल जाएंगे जिन पर संगीन आरोप हैं। इन्हें सियासी मुकदमे कह कर भ्रमित करने का काम हर दल करते हैं। उत्तर प्रदेश में कुलदीप सेंगर, रघुराज प्रताप सिंह, मुख्तार अंसारी, बृजेश सिंह, अतीक अहमद, अमर मणि त्रिपाठी, विजय मिश्र, धनंजय सिंह सुशील सिंह आदि तमाम ऐसे अपराधी मिल जाएंगे जिन्होंने राजनीति में हाथ आजमाए हैं।
इन राज्यों में भी दागदारों की भरमार
दिल्ली जहां अभी हाल ही में चुनाव खत्म हुए हैं यहां पर भी 70 विधायकों में से 43 (61 फीसदी) विधायकों पर मुकदमें दर्ज हैं। इनमें 37 पर गंभीर धाराओं में मुकदमे पंजीकृत हैं। इसके अलावा झारखंड में 81 में से 44 विधायकों, महाराष्ट्र में 176 विधायकों पर, हरियाणा में 13 फीसदी विधायकों पर आपराधिक मुकदमें पंजीकृत हैं।