यूपी में मनमाने तरीके से हो रहा एनएसए का इस्तेमाल, हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव से मांगा जवाब

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एनएसए के तहत हिरासत को चुनौती देने वाली 120 याचिकाओं पर फैसला सुनाया है। इनमें 94 मामलों में इसने 32 जिसों के डीएम के आदेशों को रद्द कर दिया और बंदियों की रिहाई के आदेश जारी किए
राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार को शर्मिंदगी उठानी पड़ रही है। हर घटना खास तौर पर गौ हत्या को लेकर आरोपियों पर एनएसए लगा देने पर कोर्ट ने नाराजगी जताई है। प्रदेश सरकार के एक कानून के उपयोग को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं। कोर्ट ने कहा पुलिस बिना सोचे समझे आरोपियों पर एनएसए लगा रही है। कोर्ट ने कहा एनएसए लगाने से पहले पुलिस को मामले की गंभीरता का पड़ताल करनी चाहिए।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक,जनवरी 2018 से 2020 के बीच इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एनएसए के तहत हिरासत को चुनौती देने वाली 120 याचिकाओं पर फैसला सुनाया है। इनमें 94 मामलों में इसने 32 जिसों के डीएम के आदेशों को रद्द कर दिया और बंदियों की रिहाई के आदेश जारी किए।
रिपोर्ट के मुताबिक, सबसे ज्यादा एनएसए के मामले गौ हत्या में दर्ज किए गए हैं। सभी आरोपी अल्पसंख्यक समुदाय से हैं और जिला मजिस्ट्रेट द्वारा प्राथमिकी के आधार पर उन पर गौहत्या निवारण कानून से जुड़ी धाराएं लगाई गई थी। इनमें से 30 मामलों में अदालत ने एनएसए के आदेश को रद्द कर दिया और याचिकाकर्ता की रिहाई के आदेश दिए।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक कई एफआईआर में कॉपी पेस्ट के मामले सामने आए हैं। नौ मामलों में उस एफआईआर के आधार पर एनएसए लगाया जिसमें दावा है कि गौ हत्या की सूचना एक अनाम मुखबिर ने दी और पुलिस ने कार्रवाई की।
13 मामलों की प्राथमिकियों में दावा किया गया कि खेत या जंगल में गौ हत्या हुई। नौ मामलों की FIR में कहा गया कि गौ हत्या एक निजी आवास की बाउंड्री के भीतर हुई और पांच मामलो में कथित तौर पर एक दुकान के बाहर गौ हत्या की बात कही गई।
रिपोर्ट के अनुसार छह मामलों में एनएसए के आदेशों में एक ही किस्म का आधार बताया गया था। इनमें कहा गया था कि कुछ ‘अज्ञात व्यक्ति’ मौके से भाग गए। घटना के कुछ मिनट बाद ही पुलिसकर्मियों पर हमला हुआ। पुलिस पर हमले के कारण लोगों ने इधर-उधर भागना शुरू किया और हालात तनावपूर्ण हो गए।
दो अन्य मामलों में आदेशों में समान आधार बताए गए हैं। इन दो मामले में कहा गया है कि महिलाएं अपने घर से बाहर जाने और नियमित काम नहीं करना चाह रही हैं। डर का माहौल बन गया और आसपास के घरों के दरवाजों के साथ ही गर्ल्स स्कूल बंद करना पड़ा। रिपोर्ट के अनुसार इस बाबत यूपी के मुख्य सचिव आरके तिवारी से जवाब मांगा गया है।