लॉकडाउन- क्या से क्या बना दिया- 30 साल इंग्लिश पढ़ाते थे अब गारा-मिट्टी ढोने को मजबूर

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देश में अभी तक ऐसा वक्त नहीं आया था जब तीन माह से ज्यादा वक्त देश ठप पड़ जाए। कोरोना वायरस की ऐसी मार कि कारोबार ठप, स्कूल-कॉलेज कब खुलेंगे पता नहीं, ये महामारी अभी कितने लोगों को निगलेगी अंदाजा लगा पाना भारी पड़ रहा है। इससे निपटने के लिए सरकार ने जो लॉकडाउन लगाया उसने न जाने कितने लोगों का जीवन ही बदल दिया। एकत फलता-फूलता जीवन नर्क सा बन गया है। ऐस नहीं कि इससे केवल दिहाड़ी मजदूर ही प्रभावित हुए हैं इसने अच्छे-खासे इंसान को भी बदलकर रख दिया है। ऐसी ही एक दिल पिघला देने वाली दास्तां सामने आई है…
ये दास्तां है केरल के पालेरी मीथल बाबू का- ये तकरीबन 30 साल से एक स्कूल में अंग्रेजी के शिक्षक थे। अच्छी खासी सैलरी थी। बच्चे को इंजीनियरिंग की पढ़ाई करा रहे हैं, एक बेटा 11 वीं कक्षा में पढ़ता है। अचानक देश में लॉकडाउन लगता है और जिंदगी की गाड़ी पटरी से उतर गई। इतने लंबे अतंराल के लॉकडाउन के कारण स्कूल बंद हो गए।
लेकिन जिंदगी है कि चलती रहती है, बच्चों की पढ़ाई का खर्च घर का खर्च, आखिर इसे भी तो पूरा करना होता है, इंसानी जीवन का अहम हिस्सा जिंदगी की गाड़ी चलती रहनी चाहिए, कुछ तो करना ही था, 55 साल के पालेरी बाबू के सामने एक ही रास्ता नजर आया, उन्होंने कन्स्ट्रक्शन साइट की तरफ बढ़ चले और वहां गारा मिट्टी ढोले लगे।
पालेरी बाबू कहते हैं, उन्हें पता नहीं स्कूल कबतक खुलेंगे, 55 साल की उम्र हो चुकी है, बच्चों की पढ़ाई है घर का खर्च है, इसे तो रोका नहीं नहीं जा सकता है। इन्हें रास्ते पर लाना है, इन सबका जुगाड़ तो करना ही है, लिहाजा वो मई के महीने से एक कंस्ट्रक्शन साइट पर जा रहे हैं। वहां से उन्हें दिहाड़ी के रूप में 750 रुपए मिलते हैं। इसी से वो उनके परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं।