कितना कठिन है जेपी (जयप्रकाश नारायण) बनना…

न्यूज डेस्क । 11 अक्टूबर का दिन यादगार दिन है क्योंकि इसी दिन 1902 में महानतम् क्रांतिकारी और समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण (जेपी) जन्म लिया था, तो 1942 में तड़क-भड़क की दुनिया के एक कलाकार अमिताभ बच्चन जी जन्मे थे। जयप्रकाश जी पर लिखने बैठा तो अनायास ही अमिताभ बच्चन जी की याद आ गयी क्योंकि नई पीढ़ी से यदि सवाल किया जाय कि वे जयप्रकाश नारायण जी और अमिताभ बच्चन जी में किसे जानते हैं ,तो मुझे लगता है 99% नई पीढ़ी जयप्रकाश नारायण जी के नाम से अनभिज्ञ तो अमिताभ जी के नाम से न केवल भिज्ञ वरन उनसे जुडी किस्से-कहानियाँ और डायलॉग्स भी बताने लगेगी।मैं सोचता हूँ कि यह हमारा ही दोष है कि हम अपनी आने वाली नस्लों को ठीक से इतिहास बता नही पा रहे हैं।
भारत में स्वतन्त्रता पूर्व और स्वतन्त्रता बाद की राजनीति को प्रभावित करने वाले जयप्रकाश नारायण जी जिन्हें जेपी के नाम से जाना गया ऐसे महान शख्सियत थे जिनसे अंग्रेज भी कांपे और आजादी के बाद के भारतीय हुक्मरान भी।जेपी वो शख्स थे जिन्होंने पदों को ठुकराया और पद उनका पीछा किये।ऐसे दुर्लभ लोग कहाँ मिलेंगे जिन्होंने कोई लिप्सा या लोभ न पाला हो,जिनका एकमात्र लक्ष्य संघर्ष हो।
गंगा और सरयू नदी के संगम स्थल पर सिताबदियारा में जन्मे जेपी जी को बचपन में देर से दांत निकलने के कारण “बऊल” (बिना दांत वाला) नाम से पुकारा गया।जयप्रकाश नारायण जी ने सम्पूर्ण जिंदगी राजसत्ता से दूर रहकर लोकसत्ता को मजबूत बनाया।
जेपी की जिंदगी शुरू से ही संघर्षपूर्ण रही।सन् 1923 में कैलिफोर्निया में पढ़ाई करते समय पैसे के अभाव में उन्होंने होटल में वेटर का काम किया।उन्होंने पढ़ाई के लिए काफी परेशनियों का सामना किया लोगों किया। कैलिफोर्निया में उसी बीच बाहरी छात्रों की पढ़ाई की फ़ीस दोगुनी हो गयी जिस नाते वे अयोवा आ गए जहां कैलिफोर्निया के मुकाबले फ़ीस चौथाई थी।यहीं 1923-24 में उनके एक प्रोफेसर ने उन्हें “जेपी” नाम से पुकारा था जो बाद में उनकी पहचान बन गया।जयप्रकाश जी 7 वर्ष तक अमेरिका रहकर पढ़े,इस दौरान वे अपना खर्च चलाने के लिए सड़े फल छांटें, बूचड़ खाना में रहे और घर-घर घूमकर क्रीम और शैम्पू तक बेचे।अध्ययन के लिए कितनी तपस्या की जाती है यह जयप्रकाश जी की जीवनी पढ़कर समझी जा सकती है।
सन् 1929 के नवम्बर माह में जब पढ़ाई पूरी कर जयप्रकाश जी अमेरिका से पटना आये तो उन्हें ज्ञात हुआ कि गांधी जी के प्रभाव में आकर उनकी पत्नी प्रभावती जी ने ब्रम्हचर्य का निर्णय ले लिया है।जेपी ने अपनी पत्नी के इस एकतरफा निर्णय का स्वागत करते हुए पूरी जिंदगी उन्ही के साथ ब्रम्हचर्य का पालन करते हुए बिता दिया।कितनी त्यागी पुरुष थे जयप्रकाश जी जो उन्होंने पत्नी के निर्णय पर अपना बलात् आदेश नही थोपा और उनके एकपक्षीय निर्णय का आदर किया।
सितम्बर 1932 में मद्रास में जब पहली बार जेपी को अंग्रेजी हुकूमत ने गिरफ्तार किया तो मुंबई के अंग्रेजी अख़बार “फ्री प्रेस जर्नल” ने लिखा कि “कांग्रेस ब्रेन अरेस्टेड।”जेपी की गिरफ्तारी के पूर्व सारे कांग्रेस नेता गिरफ्तार हो चुके थे,अकेले जेपी भूमिगत रहकर भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन को गति दे रहे थे।
8 नवम्बर 1942 को दीपावली के दिन हजारीबाग जेल से जेपी अपने साथी सालिगराम सिंह,योगेन्द्र शुक्ल,सूर्यनारायण सिंह,रामनन्दन मिश्र एवं गुलाब चन्द्र गुप्त उर्फ़ गुलाली सोनार के साथ चहारदीवारी फांदकर भाग निकले।सभी भागे हुए क्रांतिकारियों पर इनाम घोषित हो गया।18 सितम्बर 1943 को गिरफ्तार कर जेपी को कठिन यातना के साथ लाहौर जेल में रखा गया और फिर आगरा भेजा गया।
अंग्रेजी हुकूमत गांधी जी से आजादी के सवाल पर वार्ता करने का प्रस्ताव रखी जिसके बाद सारे क्रांतिकारी जून 1945 में रिहा हो गए।जेपी और लोहिया ही जेल में बन्द रहे,जिन्हें अंग्रेज छोड़ने को तैयार नही थे।जब गांधी ने अंग्रेजी रियासत से यह कह दिया कि जब तक जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया जी रिहा नही किये जाएंगे, तब तक हम आजादी के सवाल पर कोई बात नही करेंगे।
गांधी जी ने सरदार भगत सिंह की फांसी की घटना को याद रखते हुए स्पष्ट कर दिया था कि देश की आजादी एक पलड़े पर और जेपी,लोहिया एक पलड़े पर,तब जाकर अंग्रेज वायसराय वावल यह कहते हुए कि “बहुत सारे दुष्ट छोड़े गए हैं,इन्हें भी छोड़ दिया जाय” जेपी को 31 महीने बाद 11 अप्रैल 1946 को रिहा किया।
आज पद के लिए कितनी जोड़तोड़ है?पारिवारिक रिश्ते किस तरह से पद के लिए टूट-छूट रहे हैं लेकिन एक जेपी थे जिनके पीछे पद दौड़ता रहा और वे उसे झटकार कर दूर करते रहे।

सन् 1953 में जब पण्डित जवाहर लाल नेहरू जी ने जेपी को अपने केंद्रीय मन्त्रिमण्डल में रहने हेतु आमन्त्रित किया तो उन्होंने अपनी 14 कठिन मांगे रखकर खुद को नेहरू मन्त्रिमण्डल में शामिल होने से रोक लिया।
सन् 1962 में चीनी आक्रमण के समय जब सर्वपल्ली डा राधाकृष्णन ने जेपी को यह कहते हुए

सन् 1962 में चीनी आक्रमण के समय जब सर्वपल्ली डा राधाकृष्णन ने जेपी को यह कहते हुए “जेपी मेक रेडी टू टेक ओवर” नेतृत्व संभालने का आग्रह किया तो उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया।इस निमित्त समाजवादी सांसद पुरुषोत्तम त्रिकमदास जी के वहां बैठक भी हुयी थी।
सन् 1964 में पण्डित नेहरू की मृत्यु के बाद जेपी को प्रधानमन्त्री बनने का न्यौता मिला।लालबहादुर शास्त्री जी ने खुद कहा कि यदि जेपी प्रधानमन्त्री पद स्वीकार करें तो मैं अपना नाम वापस ले लूँ लेकिन जेपी ने पुनः प्रधानमन्त्री पद अस्वीकार कर दिया।
सन् 1967 में डा लोहिया और मीनू मसानी ने जेपी का नाम राष्ट्रपति पद के लिए प्रस्तावित किया लेकिन जेपी ने इससे इंकार कर डा जाकिर हुसैन को राष्ट्रपति पद हेतु अपना समर्थन दे दिया।
1977 में हुए चुनाव में जनता पार्टी को मिले प्रचण्ड बहुमत के बाद जेपी ने कोई पद न लेकर यह जता दिया कि वे वास्तव में राजनैतिक सन्त हैं।उन्होंने पद की लड़ाई लड़ने की बजाय विकेन्द्रित आर्थिक विकास और ग्राम स्वराज की अवधारणा को मूर्त रूप देने हेतु ताजिंदगी संघर्ष किया।
जेपी ने सन् 1954 में सक्रिय राजनीति से विमुख होकर भूदान आंदोलन को अपना जीवन दान दे दिया।विद्यार्थियों पर हुए लाठीचार्ज एवं इंदिरा गांधी जी के तानाशाही चरित्र से आहत जयप्रकाश जी 1974 में बिहार आंदोलन का नेतृत्व करते हुए पुनः सक्रिय राजनीति में आ गए।जेपी के नेतृत्व में हुए प्रचण्ड आंदोलन के बाद प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी जी ने 25 जून 1975 को इमरजेंसी लगा दिया और 26 जून 1975 को गांधी शांति प्रतिष्ठान दिल्ली से तड़के 4 बजे सुबह जेपी को गिरफ्तार कर बर्फ की सिल्लियों पर सुला दिया।पूरे देश का विपक्ष इमरजेंसी में जेल चला गया।1976 में होने वाले आम चुनाव को इंदिरा जी ने 1 वर्ष के लिए टाल दिया।जेल में बन्द सम्पूर्ण विपक्ष एकजुट होने लगा और अंततः 1977 के आम चुनाव में इंदिरा जी को हार का सामना करना पड़ा।जयप्रकाश जी 1977 के लोकसभा चुनाव के हीरो बनकर निकले और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में नई सरकार बन गयी।

किडनी की बिमारी से जूझते हुए जेपी जी 8 अक्टूबर 1979 को स्मृतिशेष हो गए।
देश को आजादी दिलाने से लेकर लोकतन्त्र बचाने तक के सफर में जेपी का कोई सानी नही है।चाहे अंग्रजो की तानाशाही हो या इंदिरा जी की इमरजेंसी,जेपी लड़े और केवल लड़े।वे सत्ता से लड़ने वाले एकमात्र नेता थे।स्वतन्त्रता आंदोलन में जेपी की भूमिका कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं से महत्वपूर्ण थी।वे देश और समाज के लिए लड़ने वाले महान महानायक थे लेकिन वर्तमान चकाचौंध वाले युग में जेपी नई पीढ़ी के लिए अनजान और फिल्मो में जंजीर,शोले,परवरिश,लावारिस,कुली आदि में नायक रहे अमिताभ बच्चन जी आदर्श बनकर उभरे हैं।देश की नई जनरेशन देश के वास्तविक नायकों से अनजान तो पेशेवर नायकों के गुणगान में मस्त है।हमारे असली नायक तो जेपी ही हैं जिनकी बदौलत न केवल हमे आजादी से खुली साँस लेने का अधिकार मिला बल्कि लोकतन्त्र को बेहोश करने की साजिश विफल हो गयी।हम जेपी को पूरी शिद्दत से याद करते हुए श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं।