सावधान- टूथपेस्ट, साबुन और डियो में मिला खतरनाक ‘ट्राईक्लोसन’, बदल सकता है ‘NEURO BEHAVIOR’

कोरोना काल के जूझ रहे देश को एक फिर चौंकना पड़ सकता है। नित्य तन को साफ रखने और दांतों को मांजने के लिए कहा जाता है। आप भी अपने सुन्दर दिखने के लिए ऐसा करने से परहेज नहीं करते हैं। तन साफ सुथरा रहे और दांत मोतियों जैसे चमकें इसके लिए हम भी कभी इस बात को जानने का प्रयास नहीं करते कि जिस वस्तु का इस्तेमाल कर रहे हैं दरअसल वह हमारे स्वास्थ के लिए कितना लाभदायक है। हम सभी विज्ञापनों की चकाचौंध में इस तरफ ध्यान ही नहीं देते या फिर यह कह लें कि विज्ञापन के दौरान जिस शख्स को दिखाया जाता है हम उससे ज्यादा प्रभावित होते हैं।
लेकिन इन सब के बीत एक बड़ा सवाल यह भी है कि इन विज्ञापनों में दिखने वाला उत्पाद और उसे प्रस्तुत करने वाले लोग इसका इस्तेमाल कितना करते हैं? इसके अलावा उक्त उत्पाद का इस्तेमाल करने पर आपको कितना फायदा हुआ? क्या कभी आपने ऐसा किया है, आइए आपको बताते हैं जिस उत्पाद का आप नियमित उपयोग करते हैं वह आपके स्वास्थ्य के लिए कितना लाभदायक है…
हम आज उस उत्पाद की बात करेंगे जिसके इस्तेमला के लिए हमे या सभी लोगों को रोज कहा जाता है। नहाते वक्त साबुन लगाना और दांत साफ करते वक्त टूथपेस्ट लगाना। कितना घातक है हमारे स्वास्थ्य के लिए।
आईआईटी हैदराबाद के शोधार्थियों का चौंकाने वाला शोध
दरअसल आईआईटी हैदराबाद के शोधार्थियों को टूथपेस्ट, साबुन और डियो जैसी दैनिक उपयोग की वस्तुओं में खतरनाक पदार्थ ट्रइक्लोसन की जानकारी मिली है। संस्थान के बॉयोटेक्नोलॉजी विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अनामिक भार्गव की अगुवाई में शोधार्थियों ने पाया कि ट्राइक्लोसिन को स्वीकृत मात्रा से 500 गुना कम जोड़ने पर भी यह मनुष्य के तंत्रिका तंत्र को बेहद नुकसान पहुंचा सकती हैं। यह रिपोर्ट हाल ही ब्रिटेन के प्रमुख वैज्ञानिक जर्नल “कमोस्फोयर” में प्रकाशित हुई थी।
क्या होता है ट्राईक्लोसन
ट्राईक्लोसन एक एंटी बैक्टीरियल और एंटी माइक्रोबियल एजेंट होता है जो मानव शरीर के नर्वस सिस्टम (तंत्रिका तंत्र) को प्रभावित करता है। इसे रसोई की वस्तुओं और कपड़ों में पाया जाता है। बता दें, 1960 के दशक में इसका इस्तेमाल केवल मेडिकल केयर उत्पादों में होता था। हाल ही में अमेरिका एफडीए (खाद्य एवं औषधि प्रशासन) ने ट्राइक्लोसन के खिलाफ प्रमाणों की समीक्षा के बाद इस पर आंशिक प्रतिबंध लगाया था। फिलहाल भारत मे ट्रईक्लोसन आधारित उत्पादों पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं है और न ही इसके लिए कोई नियम बनाए गए हैं।
रोजमर्रा की वस्तुओं की इसकी मौजूदगी बेहद खतरनाक है
आईआईटी के शोधार्थियों ने कहा कि ट्राइक्लोसन को बहुत सूक्ष्म मात्रा में लिया जा सकता है, लेकिन रोजमर्रा के इस्तेमाल की वस्तुओं में मौजूदगी की वजह से यह बेहद खतरनाक हो सकती है। मनु्ष्यों की तरह इम्यूनिटी रखने वील जेब्राफिश पर ट्राईक्लोसन प्रभावों का अध्ययन किया।
ट्राईक्लोसन न्यूरो-व्यवहार में बदलाव हो सकता है
डॉ. अनामिका भार्गव के अनुसार, अध्ययन से पता चलता है कि सूक्ष्म मात्रा में भी ट्राइक्लोसन न केवल न्यूरोट्रांसमिशन से संबंधित जीन और एंजाइमों को प्रभावित कर सकता है बल्कि, यह न्यूरॉन को भी नुकसान पहुंचा सकता है। यह एक ऑर्गेनिज्म के मोटर फंक्शन को प्रभावित कर सकता है।’ उन्होंने कहा कि मानव ऊतकों और तरल पदार्थों में ट्राईक्लोसन की उपस्थिति से मनुष्यों में न्यूरो-व्यवहार में बदलाव हो सकता है, जो आगे चलकर न्यूरो-अपक्षयी रोगों से जुड़ा हो सकता है।
ट्राइक्लोसन के बारे में महत्वपूर्ण बातें
– ट्राईक्लोसन का इस्तेमाल बैक्टीरियल कंटेमिनेशन से बचने के लिए रोजमर्रा के उत्पादों में किया जाता है
-इसे एंटीबैक्टीरियल साबुनों, बॉडी वॉश, टूथपेस्ट और कुछ कॉस्मेटिक्स में मिलाया जाता है
-ट्राईक्लोसिन कि अधिक मात्रा में ट्राइक्लोसन का सेवन काफी खतरनाक हो सकता है
-यह कुछ थॉयराइड हारमोन के स्तर के भी घटा सकता है