71 बरस का हुआ देश की सियासत का अगुआ ‘उत्तर प्रदेश’

आज उत्तर प्रदेश अपना 71वीं वर्षगांठ मना रहा है। आइए जानते हैं इन 71 सालों में उत्तर प्रदेश ने कितने बदलाव देखे हैं। हम ये भी बताएंगे कि किस तरह उत्तर प्रदेश देश की सियासत का अगुआ बना रहा। यहीं से निकली सियासत की धारा देश का भाग्य बदलती है। शुरुआत करते हैं देश के सियाली लहर से। उत्तर प्रदेश के 71 वर्ष की सफरनाम देखेंगे किस तरह हमारा उत्तर प्रदेश कदम-दर-कदम विकास के रास्ते पर बढ़ता रहा और उत्तम बनता रहा।
उत्तर प्रदेश के सियासी कद को परखने बैठेंगे तो आप पाएंगे की आजादी के लड़ाई से लेकर अब तक प्रदेश सियासत का केन्द्र ही रहा है। जिसने भी उत्तर प्रदेश की दिल जीता दिल्ली उसकी। इतिहास बताता है कि यहां के मतदाताओं ने देश के सिकंदरों का मुकद्दर लिखा है। धर्म, जाति, किसानों की राजनीति या फिर समाजवाद या फिर वामपंथ की विचारधारा ये विचारधाराएं उत्तर प्रदेश के देश में फैली हैं।

ये उत्तर प्रदेश ही है जिसने देश के 15 प्रधानमंत्रियों में से 9 यहीं से दिए हैं। यह बताने के लिए काफी है कि देश की सियासी लहर यहीं से बनती है और देश की तकदीर बनाती है। ‘मां गंगा ने बुलाया है’ पीएम मोदी ने ऐसे ही नहीं कहा था। 2014 के चुनाव में उतरने से पहले पीएम मोदी राजनीति की नई पारी की शुरुआत की थी। पीएम मोदी और भाजपा दोनों इस बात को जानते थे कि अगर दिल्ली के तख्त पर पाए सजाने हैं तो उन्हें उत्तर प्रदेश को पार पाना होगा। मोदी को वाराणसी की जनता ने सिर आंखों पर बिठाया और उन्हें दिल्ली का तख्त उत्तर प्रदेश ने सौप दिया।

देश की राजनीति का इतिहास पलटें तो हर पन्ने पर उत्तर प्रदेश का जिक्र मिलेगा। पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू प्रयागराज से, उनके पास लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधीस विश्वनाथ प्रताप सिंह और अटल बिहारी बाजपेयी और नरेन्द्र दामोदास मोदी सभी इसी प्रांत से आए। उत्तर प्रदेश राजनीतिक बदलाव का भी केन्द्र रहा है।
कांग्रेस के एक छत्र राज को तहस-नहस करने के लिए उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले से निकले विश्वनाथ प्रताप सिंह ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी का तख्ता पलट कर खुद पीएम बन गए। इसी वीपी सिंह ने देश की सियासत में मंडल कमंडल जैसे विष भी घोले हैं। उनकी इस राजनीति से निकले टकराव के कारण यूपी को मुलायम सिंह यादव, मायावती निकले जबकि बिहार में लालू प्रसाद यादव जैसे कद्दावर नेताओं ने जन्म लिया।
इसी तरह देश में किसान राजनीति को पटल पर लाने वाले चौधरी चरण सिंह हापुड़ से आते थे। प्रदेश में समाजवाद का झंडा बुलंद करने वाले राम मनोहर लोहिया कन्नौज क्षेत्र से चुनाव लड़े। इसके अलावा पश्चिम बंगाल में 34 सालों तक शासन करने वाले वामपंथ का उदय भी उत्तर प्रदेश से ही हुआ था। भारतीय कम्यूनिष्ट पार्टी की स्थापना 1925 में कानपुर में हुई थी।
अब वर्तमान राजनीति से भी परिचित हो लें। देश की राजनीति को ध्रुवीकरण जैसा शब्द देने वाला भी उत्तर प्रदेश ही है। राम मंदिर आंदोलन ने देश को दो ध्रुवों में बांटकर रख दिया। देश ने इसे भी देखा की कैसे राजनीति को दो केन्द्रों में बांटकर सत्ता हासिल की जा सकती है। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भाजपा मात्र दो सीटों पर सिमटी थी। इसके बाद भाजपा ने राम मंदिर निर्माण को अपने एजेंडे में शामिल किया और 1989 में लालकृष्म आडवाणी को अध्यक्ष पद सौंप दिया।
1990 में उन्होंने रथयात्रा निकाली। उसी दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव अयोध्या में कार सेवकों पर गोलियां चलवा दीं और अगले ही वर्ष 1991 में प्रदेश में पहली बार भाजपा सरकार ने सत्ता संभाली और कल्याण सिंह सीएम बनाए गए। कल्याण सिंह के शासन काल में ही राम लला हम आएंगे मंदिर वहीं बनाएंगे का नारा बुलंद किया गया। तब से भाजपा राम मंदिर के साथ रही और आज संकल्प पूरा किया। मंदिर निर्माण कार्य आरंभ हो गया। इसी के साथ अयोध्या में ही मुसलमानों के लिए भी मस्जिद की जमीन सरकार के तरफ से दी गई जिसका शिलान्यास जल्द ही होने वाला है।