महापर्व छठ 2019: इतने शिद्दत से महिलाएं क्यों मनाती हैं ये पर्व , क्या हैं मान्यताएं

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सूर्य षष्ठी का पर्व भगवान सूर्यदेव को समर्पित उनकी उपासना का पर्व है। दीपावली के छह दिन के बाद मनाए जाने वाले छठ के पर्व का हिंदू धर्म में बड़ा महत्व है। यह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तक चलता है। 4 दिनों तक चलने वाले इस पर्व में पहले दिन नहाय खाय, दूसरे दिन खरना, तीसरे दिन डूबते सूर्य की पूजा और अंतिन दिन उगते सूर्य ,को अर्घ्य दिया जाता है। मान्यता है कि छठ पर्व में सूर्योपासना करने से छठ माई प्रसन्न होती हैं और घर परिवार में सुख शांति व धन धान्य तथा संतान का वर प्रदान करती हैं। छठ का त्योहार इतने धूम-धाम से क्यों मनाया जाता है इसके पीछे कई मान्यताएं हैं। आइए जानते हैं उन मान्यताओं के बारे में जिसने इस त्योहार को इतना महत्वपूर्ण बना दिया है।

पहली मान्यता के पहले मनु प्रियव्रत के कोई संतान नहीं थी। प्रियव्रत ने कश्यप ऋषि से संतान प्राप्ति का उपाय पूछा। कश्यप ऋषि ने उन्हें पुत्रेष्ठि यज्ञ करने को कहा, इसके बाद उनकी पत्नी को संतान प्राप्ति हुई लेकिन यह संतान मृत पैदा हुई। तभी देव लोक से ब्रह्मा की मानस पुत्री प्रगट होती हैं और मृत संतान को स्पर्श करती हैं और वह जीवित हो जाता है। तब प्रियवृत ने अनेक प्रकार से देवी की स्तुति। देवी ने कहा आप ऐसी व्यवस्था करें कि धरती पर सदा हमारी पूजा हो। तब राजा ने अपने राज्य में छठ पूजन की शुरुआत की।
दूसरी मान्यता के अनुसार, किंदम ऋषि की हत्या का प्रायश्चित करने के लिए महाराजा पांडु अपनी पत्नी कुंती के साथ वन में भटक रहे थे। तभी उन्हें पुत्र प्राप्ती की इच्छा जागृत हुई। इसके लिए उन्होंने अपनी पत्नी के साथ सरस्वती नदी में सूर्य की उपासना की। इससे कुंती पुत्रवती हुई। इसलिए संतान प्राप्ति के लिए छठ का पर्व बड़ा महत्व रखता है।

तीसरी मान्यता का संबंध अगराज कर्ण से जोड़कर देखा जाता है। ऐसा धारणा है कि यह बिहारवासियों का मुख्य त्योहार है। अंग प्रदेश वर्तमान भागलपुर में है जो बिहार में स्थित है। अंगराज कर्ण माता कुंती और सूर्यदेव की संतान हैं। कर्ण सूर्यदेव को अपना अराध्य मानते थे। अपने राजा की सूर्य भक्ति से प्रभावित होकर अंग प्रदेश के निवासी सूर्य देव की पूजा करने लगे, इसके बाद यह पूरे बिहार में प्रचलित हो गया।
चौथी मान्यता के अनुसार, छठ पूजा को भगवान राम से भी जोड़कर देखा जाता है। ऐसा माना जाता है कि भगवान राम दवी सीता के साथ षष्ठी तिथि का व्रत रखा था और सरयू नदीं में डूबते सूर्य को फल, मिष्ठान एक अन्य वस्तुओं से अर्घ्य प्रदान किया। सप्तमी तिथि को भगवान राम ने उगते सूर्य को अर्घ्य देकर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद राजकाज संभालना शुरु किया। इसी के बाद से लोग भी सूर्यष्ष्ठी का पर्व मनाया जाने लगा।
छठ पूजा का पर्व चार दिनों तक चलता है –
छठ पूजा का पहला दिन नहाय खाय – छठ पूजा का त्यौहार भले ही कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मनाया जाता है लेकिन इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को नहाय खाय के साथ होती है। मान्यता है कि इस दिन व्रती स्नान आदि कर नये वस्त्र धारण करते हैं और शाकाहारी भोजन लेते हैं। व्रती के भोजन करने के पश्चात ही घर के बाकि सदस्य भोजन करते हैं।
छठ पूजा का दूसरा दिन खरना – कार्तिक शुक्ल पंचमी को पूरे दिन व्रत रखा जाता है व शाम को व्रती भोजन ग्रहण करते हैं। इसे खरना कहा जाता है। इस दिन अन्न व जल ग्रहण किये बिना उपवास किया जाता है। शाम को चाव व गुड़ से खीर बनाकर खाया जाता है। नमक व चीनी का इस्तेमाल नहीं किया जाता। चावल का पिठ्ठा व घी लगी रोटी भी खाई प्रसाद के रूप में वितरीत की जाती है।
षष्ठी के दिन छठ पूजा का प्रसाद बनाया जाता है। इसमें ठेकुआ विशेष होता है। कुछ स्थानों पर इसे टिकरी भी कहा जाता है। चावल के लड्डू भी बनाये जाते हैं। प्रसाद व फल लेकर बांस की टोकरी में सजाये जाते हैं। टोकरी की पूजा कर सभी व्रती सूर्य को अर्घ्य देने के लिये तालाब, नदी या घाट आदि पर जाते हैं। स्नान कर डूबते सूर्य की आराधना की जाती है।
अगले दिन यानि सप्तमी को सुबह सूर्योदय के समय भी सूर्यास्त वाली उपासना की प्रक्रिया को दोहराया जाता है। विधिवत पूजा कर प्रसाद बांटा कर छठ पूजा संपन्न की जाती है।
छठ पूजा- 2019
2 नवंबर
छठ पूजा के दिन सूर्योदय – 06:33
छठ पूजा के दिन सूर्यास्त – 17:35
षष्ठी तिथि आरंभ – 00:51 (2 नवंबर 2019)
षष्ठी तिथि समाप्त – 01:31 (3 नवंबर 2019)
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