कश्मीर में जम्मू से ज्यादा विधानसभा सीटें क्यों…

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वर्ष 1947 में जम्मू और कश्मीर की रियासत का भारत में विलय हुआ। तब जम्मू और कश्मीर में महाराज हरि सिंह का शासन था। वर्ष 1947 तक शेख अब्दुल्ला कश्मीरियों के सार्वमान्य नेता बन चुके थे, महाराजा हरि सिंह, शेख अब्दुल्ला को पसंद नहीं करते थे, लेकिन शेख अब्दुल्ला को पंडित नेहरू का आशीर्वाद प्राप्त था जिसके चलते सारा खेल रचा गया।
पंडित नेहरू की सलाह पर ही महाराजा हरि सिंह ने शेख अब्दुल्ला को जम्मू और कश्मीर का प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया। वर्ष 1948 में शेख अब्दुल्ला के प्रधानमंत्री नियुक्त होने के बाद महाराजा हरि सिंह की शक्तियां तकरीबन खत्म हो गई थीं।
इसके बाद शेख अब्दुल्ला ने अपना रंग दिखाना शुरु कर दिया। अपनी मनमानियों से उन्होंने जम्मू-कश्मीर का बंटाधार कर दिया और इसमें जवाहर लाल नेहरू का उन्हें बखूबी साथ मिला। इसी दौरान वर्ष 1951 में जब जम्मू कश्मीर के विधानसभा के गठन की प्रक्रिया शुरू हुई। तब शेख अब्दुल्ला ने जम्मू को 30 विधानसभा सीटें, कश्मीर को 43 विधानसभा सीटें और लद्दाख को 2 विधानसभा सीटें आवंटित कर दीं।
वर्ष 1995 तक जम्मू और कश्मीर में यही स्थिति रही। 1993 में जम्मू और कश्मीर में परिसीमन के लिए एक आयोग बनाया गया था। 1995 में परिसीमन आयोग की रिपोर्ट को लागू किया गया। पहले जम्मू कश्मीर की विधानसभा में कुल 75 सीटें थीं।
लेकिन परिसीमन के बाद जम्मू कश्मीर की विधानसभा में 12 सीटें बढ़ा दी गईं। अब विधानसभा में कुल 87 सीटें आ गईं। इनमें से कश्मीर में 46, जम्मू में 37 और लद्दाख में 4 विधानसभा सीटें हैं।
इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी जम्मू और लद्दाख से हुए इस अन्याय को ख़त्म करने की कोशिश नहीं हुई। अब 24 साल बाद एक बार फिर जम्मू-कश्मीर विधानसभा को लेकर परिसीमन की कार्रवाई पर बैठक हो रही है, उम्मीद है कि अब जम्मू और लद्दाख के नागरिकों को इस अन्याय से छुटकारा मिल जाएगा।
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