ममता की रैलीः हराने का आत्मविश्वास कम, उत्साह ज्यादा दिखा,अंतर्विरोधों में घिरा विपक्ष…अब आगे…

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कोलकाता में आयोजित यूनाइटेड इंडिया रैली में वैसे तो पीएम पद के लिए ममता बनर्जी के नाम को  पीएम पद के लिए प्रस्तावित करने की थी लेकिन किसी दल या नेता ने ममता बनर्जी के नाम को आगे नहीं बढ़ाया, अलबत्ता मंच की एकजुटता अन्तर्विरोधों के घिरी ज्यादा दिखी, इसके अलावा सबने एक स्वर से कहा कि पीएम पद के उम्मीदवार का चयन चुनाव के बाद होगा…कुल मिलाकर विपक्ष का एकजुटता की ताकत में मोदी को हारने का आत्मविश्वास कम उत्साह ज्यादा दिखा…अब चुनाव के बाद ही पता चलेगा किसमें कितना दम है…
लखनऊ। कोलकाता के बिग्रेड ग्राउंड पर ममता बनर्जी ने यूनाइटेड इंडिया रैली का बड़ा आयोजन कर विपक्ष को एकजुट करने का भरसक प्रयास किया। इस रैली के माध्यम से ममता बनर्जी को पीएम उम्मीदवार प्रोजेक्ट करने की योजना थी। इसी बात पर सबकी नजर थी। लेकिन अन्तर्विरोधों के चलते किसी ने भी उनके नाम को आगे नहीं बढ़ाया।
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लेकिन इसी रैली से ही अंतर्विरोधों का एक सवाल भी उठा। खुद ममता बनर्जी पश्चिन बंगाल में अकेले चुनाव लड़ेंगी तो वहीं कांग्रेस के स्थानीय कांग्रेसी नेताओं ने भी साफ कर दिया है कि वह तृणमूल कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ना चाहते हैं। ऐसे में रैली में मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने की बात कहां तक सार्थक कर पाएगी विपक्षी एकता।
रैली के पूर्व पश्चिम बंगाल काग्रेस के अध्यक्ष ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को ममता बनर्जी की रैली में शामिल होने से मना किया था, उनके इस आग्रह के बाद राहुल गांधी ने खुद न आकर कांग्रेस वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को शामिल होने के लिए भेजा।
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इसके अलावा महाराष्ट्र में एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने महाराष्ट्र के क्षेत्रीय दलों से तो तालमेल की बात तो करते हैं लोकिन कांग्रेस के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ने से परहेत करते दिख रहे हैं। उन्होंने मंच से भी साफ किया कि वह यहां पर नेता के चुनाव के लिए नहीं अपितु लोगों की रक्षा के लिए मंच पर एक साथ आए हैं। गठबंधन आगे कैसे चलेगा और भाजपा को कैसे रोकेंगे इस पर किसी ने कुछ नहीं कहा।
इसी तरह दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी दिल्ली में कांग्रेस के साथ किसी प्रकार के तालमेल करने से परहेज कर रहे हैं। वह किसी अन्य दल के साथ किसी भी राज्य में चुनावी गठबंधन की बात को सिरे से नकारते नजर आते हैं।
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इसी तरह से उत्तर प्रदेश में भी भाजपा के विरोध की दो धाराएं साथ-साथ आगे बढ़ रही हैं। पहली धारा सपा-बसपा गठबंधन की तरफ से बह रही है तो दूसरी धारा कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों की है। जो अपने-अपने स्वार्थों के लिए किसी के साथ भी किसी भी शर्त पर जाने को तैयार दिखाई दे रही हैं।
बसपा सुप्रीमों ने ता साफ कर दिया है कि वह कांग्रेस के किसी प्रकार का समझौता नहीं कर सकती हैं। उन्होंने कांग्रेस और भाजपा को एक ही तराजू में तौल दिया है। उनका कहना है कि दोनो ंदलित और गरीबों की विरोधी है, इसलिए वह कांग्रेस के साथ यूपी में समझौता नहीं कर सकती हैं।
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तो वहीं दूसरी तरफ अखिलेश ने भी मध्यप्रदेश चुनाव में कहा था कि कांग्रेस को बड़ी पार्टी होने का घमंड हो गया है। उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहा था कि उन्होंने सपा के साथ गठबंधन की स्थिति में महागठबंधन में शामिल नहीं होंगे। लेकिन यूपी मे वह कांग्रेस से गठबंधन चाहते थे लेकिन बसपा के साथ गठबंधन से उनके हाथ बांध दिए हैं।
हालांकि अखिलेश ने यह भी कहा कि अगला पीएम भी यूपी से ही होगा, लेकिन शनिवार को कोलकाता में आयोजित रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने कह दिया कि इस गठबंधन में दूल्हे बहुत हैं जनता जिसे चुनेगी वही बनेगा सिरमौर, जबकि इस रैली के आयोजन का मकसद था ममता बनर्जी को बतौर पीएम प्रोजेक्ट करना।
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इस रैली में कोई नेता ऐसा नहीं था जिसने ममता बनर्जी को बतौरा पीएम के लिए प्रोजेक्ट किया हो। हालांकि कुछ दिन पहले भाजपा के पूर्व नेता यशवंत सिन्हा ने कहा था कि ममता बनर्जी में पीएम बनने की सारी योग्याताएं हैं, लेकिन जब उन्होंने मंच से ममता के नाम को आगे बढ़ाने की जहमत नहीं उठाई केवल इतना ही कहा कि एक नाम सर्वसम्मति से सामने आना चाहिए जिससे मोदी को मात दी जा सके।
उधर दूसरी तरफ आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी स्थिति अलग ही है। तेलंगाना में कांग्रेस ने टीडीपी से हाथ मिलाया लेकिन करारी शिकस्त झेलनी पड़ी, अब उनके लोकसभा में साथ चुनाव लड़ने की संभावना कम ही है। पंजाब नें आप ने कांग्रेस के दुलत्ती झाड़ दी है।
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हरियाणा एक ऐसा राज्य है जहां पर राजनीतिक लाभ के चलते इनेलो और बसपा ने एक साथ चुनाव लड़ने पर हामी भरी है, जबकि दक्षिण में तमिलनाडु मे डीएमके, एआईएजीएमके साथ लड़ेगी लेकिन यहां पर एमडीएमके, पीएमके जैसे दल अलग से हुंकार भर सकते हैं।
ओडिसा में स्थित सामान्य नहीं वहां भी विपक्ष की एकजुटता को झटका लगा है। बीजेडी ने पहले ही गठबंधन से अलग रहने की घोषणा कर रखी है और वह कांग्रेस से अलग रहकर चुनाव लड़ने का फैसला किया है और सबसे महत्वपूर्ण जम्मू-कश्मीर में भी गठबंधन की स्थिति बेहतर नहीं है। यहां पर पीडीपी, नेंकां और कांग्रेस ने अलग-अलग चुनाव लड़ने की रणनीति बनाई है।
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कुल मिलाकर विपक्ष का एकजुटता की ताकत में मोदी को हारने का आत्मविश्वास कम उत्साह ज्यादा दिखा…अब चुनाव के बाद ही पता चलेगा किसमें कितना दम है…
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