अयोध्या विवादः मुस्लिम पक्ष ने कहा, मुझे पूजा पाठ से नहीं उस जगह के मालिकाना हक पर आपत्ति है

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सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या विवाद मामले की सुनवाई के दौरान मुख्‍य न्‍यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ के सामने मुस्लिम पक्षकार सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने कहा, निर्मोही अखाड़ा राम चबूतरे पर 1855 से पूजा करता था। इस पर हमें कोई आपत्ति नहीं, पूजा और पूजा के अधिकार से हमने कभी इनकार नहीं किया, लेकिन उस जगह का मालिकाना पर हमे आपत्ति है। निर्मोही अखाड़ा के पास मालिकाना हक कभी नहीं था। उस जगह का मालिकाना हक हमारे पास था। मामले की अगली सुनवाई बुधवार को होगी।
पीठ ने पूछा – आप मान रहे हैं कि आप और अखाड़ा उस जगह साथ रहे हैं
सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने कहा कि निर्मोही अखाड़ा 1734 से राम चबूतरे पर पूजा करने का दावा करता है। हालांकि, मैं कह सकता हूं कि ये बाहरी आंगन में 1855 से थे। बाहरी आंगन में ही राम चबूतरा था। उसके बारे में मान्यता रही है कि यही जगह राम की जन्मस्थली है। राम चबूतरे पर पूजा और पूजा के अधिकार को हमने कभी मना नहीं किया, लेकिन विवाद पूरी जमीन के मालिकाना हक को लेकर है। इस पर पीठ में जस्टिस एसए नजीर ने पूछा, ‘आप मान रहे हैं कि आप और निर्मोही अखाड़ा उस जगह एकसाथ रहे थे।’
धवन ने कहा, सुन्नी वक्फ बोर्ड के पास था जमीन पर मालिकाना हक
इस पर धवन ने कहा, मैंने यह नहीं कहा कि निर्मोही अखाड़ा के पास मालिकाना हक था। मालिकाना हक हमेशा सुन्नी वक्फ बोर्ड के पास था। निर्मोही अखाड़ा राम चबूतरा पर पूजा करता था। हम इसे मानते हैं कि उस जगह पूजा का अधिकार उनका ही है। निर्मोही अखाड़ा बाहरी आंगन में राम चबूतरा पर पूजा करता था। उन्‍होंने इस बारे में महंत भास्कर दास के बयान का हवाला दिया। उन्होंने माना था कि मूर्तियों को विवादग्रस्त ढांचे में रखा गया था। मैं ध्यान दिलाना चाहता हूं कि मूर्ति को अंदर वाले आंगन में शिफ्ट किया गया। इस बारे में साक्ष्य भी हैं। बता दें कि 1949 में डीएम केके नायर और सिटी मजिस्ट्रेट गुरुदत्त सिंह के फोटोग्राफ्स भी पेश किए गए।
पीठ ने पूछा, क्‍या आप सहमत हैं कि देखरेख का हक अखाड़ा को है?
धवन ने कहा कि निर्मोही अखाड़ा के गवाहों और साक्ष्यों में विरोधाभास हैं। एक गवाह का कहना था कि उन्होंने 14 साल की उम्र में राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ (RSS) जॉइन कर लिया था। बाद में आरएसएस और विश्‍व हिंदू परिषद (VHP) ने उन्‍हें सम्मानित किया था। एक अन्य गवाह ने 200 से ज्यादा मामलों में गवाही दी थी। वह कहता है कि एक झूठ बोलने में कोई नुकसान नहीं है। इस पर जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि चाहे गवाहों के बयान में विरोधाभास है, लेकिन आप अभी तक सहमत हैं कि देवस्थान की देखरेख का अधिकार निर्मोही अखाड़ा को है। अगर आप इसे स्‍वीकार करते हैं तो उनके सभी साक्ष्‍यों को मानना पड़ेगा। इस पर जस्टिस चंद्रचूड ने राजीव धवन से कई सवाल किए।
‘निर्मोही अखाड़ा पूजा का नहीं, प्रबंधन का अधिकार मांग रहा है’
जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि एक प्रबंधन और देखरेख का अधिकार लेने की बात करता है। दूसरा देवता के प्रबंधन के दावे के अधिकार की बात कर रहा है। इस पर धवन ने कहा कि ट्रस्टी और शेबियतशिप (देवस्थान के प्रबंधनकर्ता) में फर्क है। निर्मोही अखाड़ा के पास पूरी जमीन का मालिकाना हक नहीं है। अखाड़ा पूजा करने वालों की ओर से पूजा का अधिकार नहीं मांग रहा, बल्कि वह प्रबंधन का अधिकार मांग रहा है।
मुख्‍य न्‍यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ मामले की सुनवाई कर रही है। संवैधानिक पीठ में जस्टिस एसए बोबडे, डीवाई चंद्रचूड़, अशोक भूषण और एसए नजीर भी हैं। पूरा विवाद 2।77 एकड़ जमीन के मालिकाना हक को लेकर है।
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